मंगलवार, 28 जनवरी 2025

महाकुंभ

 कुम्भ आ गया है। हर 12 साल में आता है। इस बार 144 साल बाद आया है। अच्छी बात है अगर आया है तो स्वागत होना चाहिए। 

स्वागत हो भी रहा है। 45 करोड़ आस्थावान कर रहे है स्वागत, गोते लगाकर।

वैसे, इतनी भीड़ देखकर अब तो वो भी आ रहे है जो सनातन को लेकर आना-कानी करते है।

लेकिन कुम्भ तो कुम्भ है। सबको अमृत बाँट रहा है ।

इस कुम्भ की विशेष बात ये है कि सोशल मीडिया क्रांति के बाद ये पहला कुम्भ है। इसलिए मुख्य मीडिया तो है ही सोशल मीडिया वालों को भी काफी कंटैंट मिल रहा है ।

 मज़े कि बात ये कि काफ़ी फ़ैन्सी ड्रेस वाले कलाकार भी पहुँच रहे है। फ़ैन्सी ड्रेस में फोटो सेशन हो रहे है। आखिर यही फोटो तो अगले 12 साल तक जनता को दिखाये जाएंगे और बताया जाएगा कि मेरा वाला ही सबसे बड़ा वाला था। बाकी सब नकली थे मेरा वाला असली था।

इस कुम्भ ने नीले पीले हरे गुलाबी टिक वाले उन सब वैज्ञानिकों और नास्तिको कि क्रांति को ध्वस्त कर दिया है जो सनातन की हर नहाने, खाने और शीश नवाने वाली परम्पराओं का मुँह (या उचित स्थान) में बाँस लेकर विरोध करते है।

इनकी किसी ने नहीं सुनी। इनके सारे चिंतन और प्रलाप जनता ने कुम्भ जाकर विसर्जित कर दिये।

एक और प्रजाति है। एकोनोमिस्ट्स की। ये कभी एकोनिमिक्स नहीं पढे लेकिन सोशल मीडिया पर सनातनी लोगों के हर मंदिर या आयोजन में ROI ढूंढते है। हालांकि इनसे अपने घर का ROI पड़ोस वाले चाचा जी कैलकुलेट करते हैं।

इस कुम्भ और जनता ने इन सबके (कु) कर्मो पर ऐसा पानी फेरा है कि संगम से लेकर बंगाल कि खाड़ी तक ROI पूछने वालों को कोई भीख तक नहीं दे रहा ।

खैर, इस कुम्भ ने जातियों में बंटे एक समाज को एकता के एक मजबूत सूत्र में ऐसा बांध दिया है कि कम से कम 45 दिन तो सारे एक रंग में रंग गए हैं।

हमारी तो यही प्रार्थना है कि ये रंग यूँ ही चढ़ा रहे, ये एकता यूँ ही बनी रहे ताकि नकली रंगे सियार अपनी गुफाओं में ही कैद होकर रह जाएँ ।


शेष फिर... 

महाकुंभ

  कुम्भ आ गया है। हर 12 साल में आता है। इस बार 144 साल बाद आया है। अच्छी बात है अगर आया है तो स्वागत होना चाहिए।  स्वागत हो भी रहा है। 45 कर...