कहते हैं कि पाहियों की खोज मानवता के इतिहास की सबसे बड़ी खोजों में से एक थी। जिसने न सिर्फ दुनिया को गति दी बल्कि उनकी पीठ और सर का बोझ भी हल्का कर दिया। दुनिया में लकड़ी से लेकर हर प्रकार की धातु के और खिलौना गाड़ी से लेकर हवाई जहाज़ तक, हर प्रकार के पहिये बनते हैं।
किसी इंटेलीजेंट ने बाद में बैग और सूटकेस में भी पहिये लगा दिए क्योंकि उठाने से कहीं ज्यादा आसान है धकेलना। और वैसे भी पाहियों वाले सूटकेस को धकेलने का स्वैग ही अलग है-ग्लैमरस और सेक्सी। लेकिन दुनिया में कुछ लोग वो भी हैं जो समय की इस दौड़ में कभी नहीं बदले। समय की धारा में नहीं बहे। कोई ग्लैमर या आधुनिकता उन्हें छू नहीं पाई। ये वही लोग हैं जिनमे दुनिया को सिर पे ढोने की क्षमता है। ये वहीं है जो काम के तरीके पे नहीं वरन काम पर पूर्ण फोकस करते है। पाहियों वाला सूटकेस सर पर रखकर ऐसे लोग गांव की उन दबी, कुचली, फिसली महिलाओं की आवाज़ बन रहे हैं जिनके गोबर के छबड़ो के नीचे आज तक किसी ने पहिये नही लगाए। बेचारी सिर पर कपड़े का 'ऐंडुआ' बनाकर छबड़े पर गोबर ढोती हैं। उनकी आवाज़ बनना ज़रूरी है बिल्कुल उसी वज़न को सिर पर ढोकर लेकिन पहिये लगा कर। तो पहिये लगे सूटकेस वालों इतराओ मत । वो इंसान बनो जो गाँव,देहात की महिलाओं के वजन को कम कर सके। सूटकेस को घसीटों मत, सर पर रखकर ढोओ ।तभी आप सही मायनों में महमानव कहलाओगे ।
शेष फिर ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें